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लघुकथाएं | Hindi Short Stories | कोई फर्क नहीं | Dr. M.K. Mazumdar
‘कोई फर्क नहीं ’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।कोई फर्क नहीं
रामलाल ने अपने गधे को नहला कर साफ कर दिया। आज उसे मेले में जाकर बेचने वाला था।
रामलाल के कुत्ते ने गधे से पूछा, ‘‘मालिक तुम्हें बेचने के लिए मेला ले जा रहा है ..... इसका तुम्हें दुःख नहीं,’’
‘‘इसमें दुःख की क्या बात है?....... जो मुझे खरीद के ले जाएगा ..... वह भी बोझ ही तो ढ़ोएगा।’’ गधे ने सपाट स्वर में उत्तर दिया। ............... More (1987)
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