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लघुकथाएं | Hindi Short Stories | कर्म के प्रति | Dr. M.K. Mazumdar


‘कर्म के प्रति’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।

कर्म के प्रति


पिजड़े में तड़पती हुयी .... कैद मैना पिजड़े से निकलने के लिए संघर्ष कर रही थी। उसके चोंच व पंख लहू-लूहान हो चुके थे। जब वह थक जाती कुछ देर सुस्ता कर फिर से निकलने के लिए प्रयास करती।

मैना की स्थित देख कर पिंजड़ा हंस कर बोला, ‘‘ऐ कोमल चिड़िया, तु मेरे गिरफ्त से कभी नहीं निकल सकती ..... क्यों अपना नाजुक बदन जख्मी कर रही है।’’

मैना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। वह सलाखों को तोड़ने की कोशिश करती रही। धीरे-धीरे मैना की आदत पड़ गयी। पिजड़ा भी मैना से निश्चिंत रहने लगा। उसने पकड़ ढ़ीली कर दी। एक दिन पिजड़े का द्वारा भी खुल गया। मैना पिजड़े से निकल कर ..... मुंडेर पर बैठी पिंजड़े को निहारने लगी।

मैना ने कहा, ‘‘क्यों, मेरी कोशिश काम आयी न।’’

पिजड़ा भी हारे हुए नज़रों से मैने को निहार रहा था।

‘‘किसी को हार नहीं मानना चाहिए। अपनी कोशिश जारी रखनी चाहिए। सफलता जरूर मिलेगी।’’ इतना कह कर मैना पंख फड़फड़ाती दुर आकाश में उड़ान भरने लगी। ................ More  (1979)






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