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लघुकथाएं | Hindi Short Stories | लकीर | Dr. M.K. Mazumdar
‘लकीर’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।
लकीर
फस्सू ने अपने बेटे ननकू को झाडू से मार-मार कर जमीन पर लेटा दिया। ऊपर सूरज आग बरसा रहा था। जमीन पर ननकू पड़ा था, उसके नाक से खून व मुहं से फेंन निकल रहा था। शरीर पर जगह-जगह चकते व खरोंच पड़ गये थे। पास फस्सू खड़ा घोड़े की तरह हांफ रहा था।
आस-पड़ोस के लोग इकट्ठा हो गये। राह चलते मुसाफिर रूक गये। थोड़ा सुस्ताने के बाद फस्सू फिर झाडू उठाकर मारने को हुआ तो कुछ लोगों ने उसे रोका।
‘‘क्या बात है? .... लड़के को मारे ही जा रहे हो?’’
‘‘होना क्या .... किसी अजनबी का धर्म नष्ट करने की क्या जरूरत थी इसे।’’
‘‘क्या .... मतलब ....?’’
‘‘एक मुसाफिर ने इससे पानी मांगा ..... और ये पानी का लोटा लिए हाजीर हो गया .... कह नहीं सकता था ..... हम आपको पानी नहीं पिला सकते ..... हम भंगी है।’’
भीड़ खड़ी अवाक सी फस्सू को देख रही थी।......... More (1978)
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