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लघुकथाएं | Hindi Short Stories | पागल | Dr. M.K. Mazumdar
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‘पागल’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।
पागल
शहर में कफ्र्यू के बीच वह सूनसान गली से चला जा रहा था। अचानक चार पीएसी के जवानों ने उसे धर दबोचा।
‘‘कौन है तू? हिन्दू या मुसलमान?’’
‘‘मैं हिन्दु न मुसलमान, मैं तो एक अदना सा इंसान हूं।’’ उसने उत्तर दिया।
‘‘स्साला पागल लगता हैं।’’ किसी जवान ने कहा।
पीएसी के जवानों ने उसे ले जाकर पागलखाने में भर्ती कर दिया। ............ More (1982)

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