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‘दृश्य-अदृश्य’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।




दृश्य-अदृश्य


था तो कल्लू, गंगवा चमार का लड़का, हष्ट-पुष्ट ..... बदन का काला पहाड़। गंगवा हल से लगा कल्लू को पढ़ाने की बहुत कोशिश की .... प्रायमरी से आगे पढ़ा न सका।

अब कल्लू दिन भर आवारा-गर्दी करता है। चार-छः छोकरों का उसने दल बना लिया था। बात-बे-बात मारना-पीटना, गाली-गलौंच करना, लड़कियों को छेड़ना उसका रोज का नियम हो गया था। नशे की बुरी लत उसे पड़ गयी थी।

गांव वाले कह रहे थे ऐसे लक्षण व आदत ठाकुर के लड़कों में होते हैं। यह सुन कल्लू की मां कांप उठी। था तो वह गांव के मुखिया ठाकुर ही का लड़का, यह बात उसके अलावा किसी और को नहीं मालूम थी।............. More (1981)





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