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लघुकथाएं | Hindi Short Stories | संघर्ष | Dr. M.K. Mazumdar
‘संघर्ष’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।
संघर्ष
‘‘तीनों पैकेट यहीं मैंने दराज में रखे थे। दिखायी नहीं दे रहे?’’ पति ने दराज टटोलते हुए बोला।
‘‘वह मैंने संदूक में उठा रखी है’’, करवट बदल कर पत्नी ने कहा।
‘‘क्यों .....?’’
‘‘......।’’
‘‘बोलती क्यों नहीं?’’ पति चीखा।
‘‘रोज-रोज सुनते-सुनते अब कान पक गये है .... अब सहा नहीं जाता ..... शादी के तीन साल हो गये ..... पोते का मुंह।’’
‘‘तुम भी .... पढ़ी लिखी औरत होकर ....।’’
‘‘.......।’’
‘‘.......समझती क्यों नहीं, पूरी जिन्दगी चैपट हो जाएगी .... इन पांच सौ रूपल्ली में क्या होता है? ...... जब तक प्रमोशन नहीं हो जाता ..... तब तक बाहरी शक्ति से हमें इन सब बातों से संघर्ष करना होगा ...... क्या तुम भी साथ न दोगी?’’
पत्नी बिना कुछ बोले संदूक से पैकेट निकालने के लिए चल दी।.......... More (1982)
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