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‘फैसला ’ डाॅ. एम.के. मजूमदार द्वारा लघुकथा संग्रह में से एक है। इनकी लघुकथाएं देश के विभिन्न पत्रिकाओं और पेपर में प्रकाशित हो चुकी है। कल और आज के परिवेश में काफी बदलाव आया है। हो सकता है कुछ लघुकथाएं वर्तमान समय में अटपटी लगे पर अनेक लघुकथाएं आज के सदंर्भ में भी उतनी ही सटीक बैठती हैं जितनी की उस वक्त. लघुकथा के परिवेश और काल को समझने के लिए प्रत्येक लघुकथा के लेखन के वर्ष को भी दर्शाया गया है जिससे पाठक उस काल को ध्यान में रखकर लघुकथा की गहराई को महसूस कर सकें। आप भी इन्हें पढ़े और अपने विचार कमेंट बाॅक्स में जरूर लिखें।




फैसला 


‘‘बाबूजी कुछ दे दीजिए ..... कल से भूखा हूं .....।’’ मेरे सामने वह गिडगिड़ा रहा था।

‘‘मेरे यहंा काम करोंगे .....?’’ मैंने पूछा।

गिड़गिड़ाहट कोई जवाब दिये बिना आगे बढ़ गयी।

मैंने लपक कर उसे पकड़ा।

‘‘क्यों मेहनत से जी चुराते हो ..... काम करने में शर्म आती हैं। ’’

‘‘बाबूजी, काम करने में शर्म नहीं आती ..... कुछ दिनों पहले की बात है। एक साहब के यहां काम कर रहा था .... आज सुबह जब मैंने उनसे रूपये मांगें तो कहने लगे, ‘हमारा चांदी का कड़ा खो गया है। सीधे से छोड़ रहा हूं वर्ना पुलिस में शिकायत कर देता....’ बाबूजी, अगर उनका चांदी का कड़ा खोता तो क्या वे मुझे ऐसे ही छोड़ देते? इसलिए बाबूजी मैंने सोचा, किसी के यहां काम करने से अच्छा है मैं मांग कर गुजारा करूं।’’

जब मेरी चेतना लौटी वह दिखाई न दिया।.......... More  (1983)




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